नवरात्र मनाने की परम्परा कब से आरखा हुई, इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से तो कुछ नहीं कहा जा सकता; पर पौराणिक एवं किम्ददन्तिक कथाओं के आधार पर इस सम्बन्ध में तरह-तरह के अनुमान ही लगाये जाते हैं । इसी प्रकार नवरात्रों का सम्बन्ध किसी धार्मिक प्रक्रिया के साथ है या प्रमुख रूप से प्रकृति और कृषि-कार्यों के साथ, इस सम्बन्ध में भी निश्चित रूप से कुछ कह पाना सम्भव नहीं । वह इस कारण कि दोनों से सम्बन्ध रखने वाली क्रिया-प्रक्रियाएँ इन दिनों लगभग साथ-साथ चला करती हैं ।

लोग जव की खेत्री (खेती) भी बोते हैं और देवी मानकर ही उसे उगा देख उसकी पूजा कर प्रसन्न भी हुआ करते हैं । दूसरी ओर दुर्गा देवी की पूजा भी लगातार नौ दिनों तक करते रह कर बच्चियों (कंजकों) को पूज कर खिलाया भी करते हैं । यह सभी ध्यातव्य है कि नवरात्र प्रतिवर्ष में एक बार नहीं; बल्कि दो बार मनाए जाते हैं । नवरात्र का पर्व मुख्यत: व्रतोपवास रूप में मनाने की परम्परा है । एक बार यह विजय- दशमी (दशहरा) आने से पहले मनाया जाता है ।

कहा जाता है कि लंका पर आक्रमण करने से पहले श्रीराम ने दुर्गादेवी की पूजा अर्चना की थी, अत: तब विजयदशमी से पहले एकम से लेकर नवमी तिथि तक व्रत रखकर देवी-पूजा करने की परम्परा का इन (नवरात्रों) के साथ जुड-जाना समझ में आता है; पर खेत्री क्यों बोई जाती है, इस रहस्य को समझ पाना कठिन बात है । यह भी प्रसिद्ध है कि राम-रावण का युद्ध निरन्तर नौ दिन चलता रहा और दसवें दिन श्रीराम विजयी हुए । अत: नौ दिनों तक उनकी विजय के इच्छुक देवी-पूजा एवं व्रतोपवास करते रहे होंगे ।

यह भी समझ में आने वाली बात हैं । सो आज भी नवरात्रों में देवी-भक्त ही नहीं आम हिन्दू-परिवारों में विशेष कर स्त्रियाँ व्रतोपवास कर खेत्री भी बीजा करती हैं और कंजके या बालिकाएँ भी जिंमाया करती हैं । दसवें दिन दशहरे का त्योहार व्यापक स्तर पर स्त्री-पुरुष सभी मनाते हैं-वह भी नौ दिन रामलीला करने के बाद, इस तथ्य से हम सभी लोग भली-भाँति परिचित हैं । नवरात्र को व्रतोत्सव के रूप में मनाने के साथ एक प्रमुख कथा और भी जुड़ी हुई है । कहते हैं कि महिषासुर नामक दैत्य ने देवताओं को अत्यधिक पीड़ित-आतंकित कर रखा था ।

अपने बचाव का उपाय न देख देवराज इन्द्र के नेत् त्व में देवताओं ने ब्रह्मा के पास पहुँच अपनी रक्षा की गुहार की । तब ब्रह्मा जी की सलाह से देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियाँ प्रदान कर उनके सम्मिलित रूप से एक अदम्य शक्ति (देवी) का सृजन किया । शक्तिस्वरूपा, सिंहवाहिनी वह देवी लगातार नौ दिनों तक महिषासुर के साथ भयानक युद्ध करती रही । अन्त में दसवें दिन देवी उसे मार पाने में सफल हो सकी । सो जब तक (नौ दिन) देवी महिषासुर से युद्ध करती रही, सभी देवी-देवता और धरती के स्त्री पुरुष उस सिंहवाहिनी की पूजा-अर्चना करते रहे ।

महिषासुर के वध से प्रफुल्लित होकर उन्होंने कन्याओं को खिला-पिलाकर दान-दक्षिणा दी । इसी परम्परा का निर्वाह नवरात्रों में आज भी किया जाता है । इस कथा को मान लेने के बाद भी यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है कि इन दिनों में जौ के बीज बोने-उगाने का आखिर क्या अर्थ एवं प्रयोजन है? , इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए हमें मानव की विकास-यात्रा के सुदूर अतीत के अध्यायों को छानना होगा ।

नृतत्व वेत्ता एवं समाज-शास्त्री यह तथ्य निभ्रान्त रूप से स्वीकार करते हैं कि आदि काल में मानव समाज या तो पहाड़ी कन्दराओं में या फिर वृक्षों की डालियों पर रहा करता था । इसी प्रकार या तो वह जंगली जानवरों का शिकार कर अपना पेट पाला करता था या फिर वृक्षों पर उगे फल-फूल खाकर गुजर-बसर किया करता था । फल खाने के बाद बीज आस-पास फेंक देता । समय पाकर धरती की माटी में मिल वर्षा-पानी पाकर प्राकृतिक नियम से वे बीज फिर से उगकर वृक्ष का रूप धारण कर लेते और फल-फूल देने लगते ।

इस प्राकृतिक प्रक्रिया ने आदि मानव को चकित-विस्मित किया, फिर कुछ बौद्धिक विकास हो जाने पर स्वयं फसलें उगाने की प्रेरणा-प्रोत्साहन दिया । सो घरों पर रहने वाली औरतों ने कुछ बीज माटी कुरेद कर उसमें बी दिए, जो मात्र नौ दिन में ही सभी को चकित करते हुए अंकुरित हो उठे । यह देख कर नारियाँ तो प्रसन्नता से नतमस्तक हो नाच ही उठीं, पुरुष समाज भी भाव विभोर हुए बिना न रह सका ।

सो एक मान्यता के अनुसार नवरात्रों में जो जौ बोने की परम्परा है, वह उस शुभ दिन को याद दिलाने वाली है कि जब नारी-शक्ति के प्रयत्न से मानव- जाति में मात्र नौ दिन में बीजों को अंकुरित कर अपने लिए फुसल उगाना सीख लिया था । हमें लगता है, अप्रैल मास में जो नवरात्रोत्सव मनाया जाता है, खेत्री बोई जाती है, वह उस पावन दिन का स्मरण कराने के लिए ही है कि जब मानव ने पहली फसल उगाई थी– यद्यपि देवी-पूजा और व्रतोपवास इन नवरात्रों के साथ भी जोड़ दिया गया है ।

कारण कुछ भी क्यों न हो; पर इतना स्पष्ट है कि नवरात्र मानव जाति पर देवी और प्राकृतिक शक्तियों की कृपा होने का प्रतीक उत्सव तो है ही, असत्यपूर्ण आसुरी शक्तियों पर दैवी और मानव शक्तियों द्वारा विजय पाने का प्रतीक भी है । महिषासुर से रक्षा करने वाली शक्ति भी माता है और फसल उगाने की बुद्धि-शक्ति देने वाली प्रकृति भी माता है । यदि इन्हें सम्मिलित कर दिया गया है नवरात्रों में, तो भी कुछ अनुचित नहीं कहा जा सकता ।

 


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